कविता
मुनादी
-राजेश त्रिपाठी
राजा ने करायी मुनादी
ये जो है देश की
गरीब आबादी।
ये हो गयी है पेटू बड़ी
आ खड़ी हुई है इससे
देश में मुश्किल घड़ी।
इसके चलते बढ़ गये
जिंसों के दाम
जिससे तबाह है
देश का हर खासोआम।
बड़े हो गये हैं इसके सपने
हद से आगे बढ़ गयीं
इसकी उम्मीदें।
व्यंजन जीम रही है
वह आबादी जो थी
सूखी रोटी की आदी।
राजा साहब हैं परेशान
देश की समस्या का
भला क्या हो समाधान।
मंत्री से कहा निकालो कोई राह
यह बढ़ती महंगाई
मुल्क को कर रही तबाह।
मंत्री ने कहा हुजूर
एक रास्ता है जरूर
पर क्या वह होगा सबको मंजूर।
राजा बोले मुंह तो खोलो,
सबकी छोड़ो
तरकीब तो बोलो।
मंत्री बोला जनाब
जो देख रहे हैं बड़े ख्वाब
उनके ख्वाबों के
कतर दे पंख।
उन पर लगा दें ऐसी पाबंदी
जिसकी सोच से हो जाये
उनका जीना हराम
न रातों को नींद न दिन को आराम।
ऐसे में वे भूल जायेंगे
हर सुख-चैन
आंसुओं में डूब जायेंगे ।
उनके नैन।
खाना तो क्या वे
खुद को जायेंगे भूल
तब न उनकी आंखों में
सपने संजेंगे
न वे चैन से रहेंगे।
तब वे न गा सकेंगे
न बजा सकेंगे
चैन का बाजा।
ये सुन मुसकराये
खुश हुए राजा।
नगमे मेरे
गीत, गज़ल, कविताएं
Wednesday, February 23, 2011
Wednesday, September 15, 2010
जाने कितने कैदखाने
कविता
राजेश त्रिपाठी
हमने अपने गिर्द
खड़े कर रखे हैं
जाने कितने कैदखाने
हम बंदी हैं
अपने विचारों के
आचारों के
न जाने कितने-कितने
सामाजिक विकारों के।
हमने खींच रखे हैं
कुछ तयशुदा दायरे
अपने गिर्द,
उनमें भटकते हम
भूल बैठे हैं कि
इनके पार
है अपार संसार।
उसकी नयनाभिराम सृष्टि,
उसके रंग, उसकी रौनक।
हम बस लगा कर
एक वाद का चश्मा
बस उसी से दुनिया
रहे हैं देख।
वाद का यह चश्मा
सिर्फ खास किस्म की
दुनिया लाता है सामने।
उसेक परे हम
कुछ नहीं देख पाते
या कहें देखना नहीं चाहते।
इस चश्मे का
अपना एक नजरिया है
अपना सिद्धांत है
यह क्रांति को ही
बदलाव का जरिया
मानता है
लेकिन बदलती दुनिया
कर चुकी है साबित
हर क्रांति धोखा है छलावा है
अगर उसमें इनसानी हित नहीं।
हम इन विचारों से आना है बाहर
हम आजाद हो जाना चाहते हैं
खास किस्म के वाद से
जो आदमी आदमी में
करता है फर्क
जो सुनना नहीं चाहता
कोई तर्क।
हम आजाद होना चाहते हैं
हर उस बंधन से
जो रच रखा है
हमने अपने गिर्द
राजेश त्रिपाठी
हमने अपने गिर्द
खड़े कर रखे हैं
जाने कितने कैदखाने
हम बंदी हैं
अपने विचारों के
आचारों के
न जाने कितने-कितने
सामाजिक विकारों के।
हमने खींच रखे हैं
कुछ तयशुदा दायरे
अपने गिर्द,
उनमें भटकते हम
भूल बैठे हैं कि
इनके पार
है अपार संसार।
उसकी नयनाभिराम सृष्टि,
उसके रंग, उसकी रौनक।
हम बस लगा कर
एक वाद का चश्मा
बस उसी से दुनिया
रहे हैं देख।
वाद का यह चश्मा
सिर्फ खास किस्म की
दुनिया लाता है सामने।
उसेक परे हम
कुछ नहीं देख पाते
या कहें देखना नहीं चाहते।
इस चश्मे का
अपना एक नजरिया है
अपना सिद्धांत है
यह क्रांति को ही
बदलाव का जरिया
मानता है
लेकिन बदलती दुनिया
कर चुकी है साबित
हर क्रांति धोखा है छलावा है
अगर उसमें इनसानी हित नहीं।
हम इन विचारों से आना है बाहर
हम आजाद हो जाना चाहते हैं
खास किस्म के वाद से
जो आदमी आदमी में
करता है फर्क
जो सुनना नहीं चाहता
कोई तर्क।
हम आजाद होना चाहते हैं
हर उस बंधन से
जो रच रखा है
हमने अपने गिर्द
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